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Sunday, July 31, 2011

फ़िर भी कम्बख़्त....














तू जिस दुनिया में रहता है, वहां सुकूं ही नहीं,
इच्छाओं का जहाँ क्षण-प्रतिक्षण, बदलाव होता है,
वक्त तेरी पहुंच से भी कही ज्यादा, दूर खड़ा है,
फ़िर भी कम्बख़्त, तू वक्त को पकड़ने चला है. [१]


नयनों को धूल-धूसित कर, खुद अन्धा बन गया है,
मन के चक्र को, सहसा बिन पहिये दौड़ा रहा है,
उम्मीद के पंछियों को, नाकामी से उड़ा दिया तुमने,
फ़िर भी कम्बख़्त, उन पंछियों को पकड़ने चला है. [२]


तू अपनी कमजोरियों को, गले से लगाये बैठा है,
वक्त-दरवक्त यूं बेवक्त होता जा रहा है,
तू श्रमहीन, कर्महीन, उद्देश्यविहीन हो गया है,
फ़िर भी कम्बख़्त, कामयाबी को पकड़ने चला है. [३]


तुमने कसकर, दिलो जान से मुट्ठी बांध ली,
पकड़ना चाहता ऐसे, कि जैसे फ़िर ना छोड़ेगा,
मगर ये क्या, तेरी सारी ख़्वाइशें तो बिमार हैं,
फ़िर भी कम्बख़्त, रेत को पकड़ने चला है. [४]

......गर पकड़ना है तो अपनी उड़ती इच्छाओ को पकड़,
......और लग जा पूरे मन से उन्हें पूरा करने में,
......फ़िर देख बन्दे क्या होता है ????





Saturday, July 30, 2011

आत्मग्लानि.......


उठा के मुझको मेरा मन, धरा पे फ़ेंक देता है.
मुकर जाता है, मुझसे ही, गर मुझको देख लेता है,
जो रोता हूँ, तो कहता है, मेरी आँखों में पानी है.
ये मेरी आत्मग्लानि है,ये मेरी आत्मग्लानि है...[१]


मै अपने आप को ही आज़, सहसा देख ना पाया,
खुला था दिल, खुला दिमाग, कुछ भी सोच ना पाया,
अपने आप को दे दी, ये कैसी निशानी है ?
ये मेरी आत्मग्लानि है,ये मेरी आत्मग्लानि है...[२]


मेरी परछाई भी मुझसे, अब पीछा छुड़ाती है,
मै जितना पास आता हूँ, वो उतना दूर जाती है,
वो सीधी है, मै लंगड़ा हूँ, ऐसा दिख रहा मुझको,
पकड़ना चाहता तो हूँ, वो पल में भाग जाती है,
समझ ना पा रहा कुछ भी, कैसी ये कहानी है ?
ये मेरी आत्मग्लानि है,ये मेरी आत्मग्लानि है...[३]


समय आता, चला जाता, उसे मैं देख ना पाता,
निकट होता था मेरे वो, मगर कुछ सोच ना पाता,
उचित उपयोग ना करता, उसे मै व्यर्थ करता था,
उसे मैं फ़ेंक देता था, गर मेरे पास रहता था,
जो ना आया, तो अब किस्मत, लूजी-लंगड़ी-कानी है,
ये मेरी आत्मग्लानि है,ये मेरी आत्मग्लानि है...[४]


समय तेरी उपयोगिता को, कभी मैं आंक ना पाया,
तू मेरे घर में बैठा था, तुझे मैं झाँक ना पाया,
मेरे जीवन में तेरा मुल्य, समझ ये आ गया मुझको,
तू इश्वर है, विधाता है, मन में रख लिया तुझको,
ये जीवन तुझपे अर्पण हो, अब मैने ठानी है,
ये मेरी आत्मग्लानि है,ये मेरी आत्मग्लानि है...[५]


Wednesday, July 27, 2011

ये पत्थर भी कुछ कहते है.........


ये पत्थर जो, हिमालय की चोटियों मे रहते हैं.

पृथ्वी की असहनीय कम्पन से, टूट जाते हैं.

टूटकर कम्पन से ये गंगा की गोंद में समा जाते हैं,

और होकर अनभिज्ञ, सुदूर भ्रमण को निकलते है,

जरा गौर से देखो, ये पत्थर भी कुछ कहते है.[१]



टुकड़ों में विभाजित होकर, अपनों ने अलग हो जाते है,

अपनों से अलग होकर, ये भी बहुत घबराते हैं.

चलना इनकी मजबूरी है,अपनो से अलग हो चलते हैं,

बड़ों को पीछे छोड़, छोटे आगे तेज़ निकलते हैं

जरा गौर से देखो, ये पत्थर भी कुछ कहते है.[२]



छोटे पत्थर,प्यारे पत्थर कितने हैं मासूम,

कौन है अपना कौन पराया, नही इन्हे मालूम.

होकर पंजाब, यू.पी. से, बंगाल की खाड़ी को ये निकलते हैं.

जरा गौर से देखो, ये पत्थर भी कुछ कहते है.[३]



चल-चलकर ये थक जाते, ना लेते कहीं आराम,

इतने विशाल समन्दर में,करना पड़ता इनको कितना काम,

पल-पल अपने ऊपर, अनगिनत पत्थरों का भार सहते हैं

जरा गौर से देखो, ये पत्थर भी कुछ कहते है.[४]



इन्हे सिर्फ़ पत्थर ना समझो, ये मानव जीवन को दर्शाते हैं,

जीवन की असीमित गति को, ये पत्थर खूब बताते हैं.

फ़र्क सिर्फ़ इतना है, ये गंगा में बहकर, बंगाल की खाड़ी को जाते हैं,

और हम, समुद्ररूपी जीवन में बहकर, गंगा में समा जाते हैं.

जरा गौर से देखो, ये पत्थर भी कुछ कहते है.[५]

                                                                                                  - सुरेश कुमार

                                                                                                      भूवैज्ञानिक


Wednesday, July 20, 2011

कुंठित मन की कुंठा......


कुंठित मन की कुंठा मन में कूट-कूट कुम्ह्लाती है.
विषम विदाई की घड़ी, निकट मेरे जब आती है..
क्षण भर की भी दूरी जो, मन को मेरे स्पर्श करे.
हरी - भरी धरती ये मन की, बंजर सी हो जाती है..

उन्मोदित उल्लेखन उनका, सारी उमर मै करता हूं.
पुलकित पुष्प की पुष्पसुगंधा, जीवन अर्पित करता हूं..
जीवनरुपी धारा मे सहज-सरल बह चलता हूं.
संवेदन संपूर्ण संगिनी, तुम्हे समर्पित करता हूं...

कण-कण मे कंठस्त हुई तुम, कमल-कुमुदनी कार्यसंगिनी.
करुणामयी ये काया तेरी, बसी हृदय में हृदयरागिनी..
मंत्रमुग्ध, मदमस्त ये मौसम मन-मोहित कर लेता है..
मधुबेला मे मधुर मिलन, अगर तेरा हो मनमोहिनी...

विचारों के विश्लेषण में, सिर्फ उनका ही व्याख्यान रहे..
धरा-गगन, एकांत इस मन में केवल उनका ध्यान रहे...
प्रियतमा प्यारी प्रेम प्रतिज्ञा प्रियवर की याद सताती है...
कौतूहल कोलाहल में भी तन्हा सी कर जाती है...
विषम विदाई की घड़ी, निकट मेरे जब आती है..
कुंठित मन की कुंठा मन में कूट-कूट कुम्ह्लाती है....
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मेरी अर्धांगिनी शिल्पी रंजन को समर्पित...
          रचयिता: सुरेश कुमार

Wednesday, July 13, 2011

वो आये हमसे मिलने******



वो आये हमसे मिलने, तो ये मौसम भी गुनगुनाने लगा,
खुशी का अब कोई ठिकाना नही, भरी महफिल मे ये बताने लगा.
वो आये हमसे मिलने, तो ये मौसम भी गुनगुनाने लगा.
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उनका मुझे अपने गले से लगाना, बहुत अच्छा लगता है,
अपनी सांसो को मेरी सांसों से मिलाना,बहुत अच्छा लगता है,
दिल ने कहा, ऐ वक्त यहीं थम जा, तू क्यों अपनी ही सुनता है.
सिर्फ़ आज मेरी सुन ले, क्यों अपने मन की करता है.
पर ये तो वक्त है, कम्बख्त यूहीं गुजर जाता है..
दिल में ये बीती हुई बस यादें छोड् जाता है..
ये हसीं वक्त भी गुजर जायेगा, ना जाने दिल क्यों घबराने लगा.
वो आये हमसे मिलने, तो ये मौसम भी गुनगुनाने लगा,
खुशी का अब कोई ठिकाना नही, भरी महफिल मे ये बताने लगा.
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Sunday, July 10, 2011

आरजू है उनसे मिलने की...


आरजू है उनसे मिलने की,पर मिल ना पाऊंगा..
ना मिला तो लगता है, अब जी ना पाऊंगा .
संग उनके हमने खुशियों के समन्दर मे गोते लगाये हैं.
जो अब मिला है गम तो ये किसको बताऊंगा...
आरजू है उनसे मिलने की,पर मिल ना पाऊंगा.......
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उन्हे पता है इस दिल की धड्कन क्यों थम सी जाती है..
उनके ना होने का एहसास,इस दिल को अब पल-पल सताती है..
वो आ गये तो समझना मेरी सांसे अभी भी चल रही है..
और ना आये तो जैसे, मर ही जाऊंगा...
आरजू है उनसे मिलने की,पर मिल ना पाऊंगा..
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वो मेरे मन की कलाकृति है, उन्हे पता है.
वो मेरी खुशी, सिर्फ़ मेरी आकृति है, उन्हे पता है..
मेरे मन की हर तरंगो मे बस गयी है वो.
खुश्बू की तरह हर सांस मे सिमट गयी है वो..
प्यार के ये फूल, दिल-ए-गुलशन में जाने कब खिलाउंगा...
आरजू है उनसे मिलने की,पर मिल ना पाऊंगा..
                                    
                                     By Suresh Kumar
                                           Geologist
                                             GSI

Friday, July 08, 2011

******जब मै अकेला था******



जब मै अकेला था, तब अक्सर सोचा करता था,
कि, सच मे ये प्यार होता क्या है.
एक अहसास, जिसे लोग प्यार से गले लगाते है,
एक उम्मीद, जिसके भरोसे लोग जिन्दगी बिताते है,
एक विस्वास, जिसे लोग अपने हृदय मे बसाते है,

वो अहसास, वो उम्मीद, वो विस्वास होता क्या है,
कि, सच मे ये प्यार होता क्या है.
जब मै अकेला था, तब अक्सर सोचा करता था,
कि, सच मे ये प्यार होता क्या है.

मेरे इस विचलित मन ने, कई बार मुझे टोका,
मुझसे कहा,
"तुम अकेले हो तो रहो, मुझे किसी का साथ चाहिये",
हाथ है अकेला मेरा, इसमे किसी का हाथ चाहिये,
जो खुश्बू बनकर मेरे मन मे समाये, उसकी मुझे जरूरत है,
जो मेरी जिन्दगी, मेरी उम्मीद, मेरी मोहब्बत है"

मैने अपने इस अबोध मन से कहा,
रे पगले, ये मोहब्बत क्या है, जिसके लिये लोग मिट तक जाते है,
ना रहती है जीवन की लालसा, ना दुख सताते है,
दुख के समन्दर मे, सुख के गोते लगाते है,
और एक दिन उसी समन्दर मे डूब कर, खो जाते है,

मेरे मन अब तू ही मुझे बता,
वो मोहब्बत, वो दुख का समन्दर होता क्या है,
कि, सच मे ये प्यार होता क्या है.
जब मै अकेला था, तब अक्सर सोचा करता था,
कि, सच मे ये प्यार होता क्या है.

मेरा मन क्षण भर के लिये शून्य हो गया,
ऐसा लगा जैसे अंजान से रस्ते पे खो गया.
वहीं रुका और अपने हमनवां को तलाशने लगा,
और मिल गयी जो मोहब्बत, तो बस उसी का हो गया.
फिर मुझसे कहा..
प्यार का दूजा नाम ही विस्वास है,
ये अपनेपन की इक सच्ची आस है.
गैरों के लिये ये कुछ ना हो,
पर अपने लिये बहुत खास है.
वो विस्वास संग मे है,
तभी तो मै दुख के समंदर मे भी सुख के गोते लगाता हूं,
वो सच है जिसे मैने अपनाया है..
उसे मैं अपने आस-पास हर वक्त पाता हूं..
यही वो सच है जो मेरा है और तेरा है,
रे पगले अब ना सोच, तू इतना सोचता क्या है..
जब मै अकेला था, तब अक्सर सोचा करता था,
कि, सच मे ये प्यार होता क्या है.
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            By Suresh Kumar

              Geologist
                                                                                                                           GSI

Thursday, July 07, 2011

य़ूं तो कोई बात होगी....


बैठे हो तन्हा, यूं तो कोई बात होगी.
रात की परछाइयों से हो रहे हो रूबरू,
            यूं तो कोई बात होगी...
ठंडी हवा से तेरी पलक का झपकना,
शिहर कर वो तेरा, अपनी हथेली को मलना.
फ़िर अंगडाई लेकर यूं चांद को देखना,
देखकर् उसे, उन्ही खयालों मे डूब जाना,
            कोई तो बात होगी...
बैठे हो तन्हा, यूं तो कोई बात होगी.
हृदय से उत्पन्न, मन की तरंगों को सुन रहे हो,
मन की परछाइयों को यू तन्हा तलाश रहे हो.
या मन के अधियारों में यू तन्हा झांक रहे हो,
मन के अधियारों में तो, उजियारों की सौगात होगी.
बैठे हो तन्हा, यूं तो कोई बात होगी.
सोचते-सोचते तेरे अधरों क बन्द हो जाना,
बन्द होकर भी इनका बहुत कुछ् कह जाना.
फ़िर भी डूबते चांद का, कुछ भी समझ ना पाना.
            कोई तो बात होगी...
बैठे हो तन्हा, यूं तो कोई बात होगी.
देखो चांद अभी डूबा नही है,
      शायद तुम्हारी अनकही बातों को समझ रहा है.
उसके पथ से उसे भ्रमित ना करो,
उसकी तमन्नाओ के परे उसे विफ़लित ना करो,
उसे बता दो, उसे भी शयन कक्ष मे जाना होगा,
फिर कभी तन्हा रातों मे तुमसे मिलने आना होगा,
चांद को भी ना बताया, कोई तो बात होगी.
बैठे हो तन्हा, यूं तो कोई बात होगी.
रात की परछाइयों से हो रहे हो रूबरू,
            यूं तो कोइ बात होगी...
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                              By Suresh Kumar
                                      Geologist
                                        GSI






Wednesday, July 06, 2011

"ये जिन्दगी भी"



ये जिन्दगी भी अजीब मोड् पर लाती है.
कभी खुद् पर हसती है, कभी दुसरो से हसवाती है..
वो वक्त कितना हसीन था जो गुजर गया.
अब सिर्फ़् उस वक्त की याद् सताती है...
ये जिन्दगी भी अजीब मोड् पर लाती है........
हमारा रिस्ता भी अजीब है, यह इक नदी के दो किनारो जैसा है.
जो साथ तो हमेशा रहते है, पर कभी मिल नही सकते..
जो हमेशा इक दूजे को देखते है, पर् कुछ् कह नही सकते..
सिर्फ़् इनके मन की तरंगे ही साथ मे लहराती है...
ये जिन्दगी भी अजीब मोड् पर लाती है..............
कभी ये जिन्दगी कितनी हसीन हुआ करती थी...
बस ये समझ लो, इक पुष्प की तरह खिला करती थी..
वो पुष्प जिसे अपनी महक से बहुत प्यार है..
वो पुष्प जिसे अपने खिलने पर बहुत नाज है...
आज वो पुष्प खिला तो है, पर उसकी महक उसके साथ नही है..
उसे देख कर लगा, कि वो जिन्दा तो है पर उसकी सांसें उसके साथ नही है..
पुष्प की इस हालत पे, अब तो कलियां भी यही बताती है..
ये जिन्दगी भी अजीब मोड् पर लाती है.
कभी खुद् पर हसती है, कभी दुसरो से हसवाती है..
वो वक्त कितना हसीन था जो गुजर गया.
अब सिर्फ़् उस वक्त की याद् सताती है...
                       ये जिन्दगी भी अजीब मोड् पर लाती है........
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                                     By Suresh Kumar
                                         Geologist
                                         GSI