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Wednesday, September 28, 2011

रूप-स्वरूप-दिल-ए-ख्वाइश....

ना अंजन, ना श्रृंगार, अद्भुत तेरी सौन्दर्य छटा,
तन यौवन का चरमबिन्दु, अधर खुले, बरसे घटा,
बंद पलक में निशा बसे, खुली पलक में भोर,
हृदय-मुग्ध करती हो प्रतिपल, इत-उत व चहुँ ओर.[१]


बिन घुँघरू पग अतिशोभित, बिन कंगन ये हस्त,
प्रकृति-अंश समान ये काया, करे सदा मदमस्त,
मनु तुम-पर मन से मरा, इतना सुन्दर रूप,
तुम सावन हो, तुम बरखा, तुम हो रति स्वरूप. [२]


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मैं देखूँ इश्क की गलियाँ, मुझे ऐसी नज़र दे दो,
छुपालो अपनी आँखों में, सुकूँ की इक बसर दे दो.
मैं राही हूँ मोहब्ब्त का, मोहब्बत रग में बसती है.
चलो अब साथ बस मेरे, कसम ये हमसफ़र दे दो. [३]


खुश्बू-ए-इश्क के पंछी, चलो हम साथ उड़ जायें,
जहाँ हो अन्त लम्हों का, वहाँ जाकर ठहर जायें,
बसायें आशियान इक, मोहब्बत नाम हो उसका,
हम जीते है मोहब्ब्त में, मोहब्बत में गुज़र जायें. [४]


                                                                                            सुरेश कुमार
                                                             २८/०९/२०११

6 comments:

sushma 'आहुति' said...

बहुत ही सुन्दर....

रविकर said...

खूबसूरत प्रस्तुति ||

बधाई ||

नवरात्रि पर्व की बधाई और शुभकामनाएं

dcgpthravikar.blogspot.com

dineshkidillagi.blogspot.com
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चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...वाह!

रेखा said...

खुबसूरत प्रस्तुति ...

अभिषेक मिश्र said...

इश्क की गलियों को देखने की नजर तो तुमने ही पाई है. बधाई.

anita agarwal said...

sab taraf saundarya ras chitka hua hai .... sunder rachana.....