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Wednesday, December 28, 2011

अधूरापन.....

क्यों दिखता है ये अधूरापन ?
पर्वतों से गिरते झरनों के पानी,
आगे बढ़ते ही नही, थम जाते है,
हवायें बहती है, मेरे करीब आती नही,
दिये जलते है पर घर-आँगन में अंधेरा
छाया है, इक सन्नाटे की आवाज़
मेरे कान के पर्दे को चीर रही है,
मेरी चीखें मुझ तक ही गूँज
रही है, किसी को सुनाई नही देती,
मेरी परछाई कड़क धूप में मेरे
संग नही, अदृश्य है,
समंदर के किनारे दौड़ता हूँ पर
मेरे पदचिह्न दिखते ही नही,
ये कैसा शून्य-तनन है संवेदन ?
बेज़ान धड़कती क्यों धड़कन ?
क्यों दिखता है ये अधूरापन ?
                                  सुरेश कुमार
                                     २६/१२/११







Wednesday, December 14, 2011

वो भी ज़मी पर आया होगा.....

खूबसूरती ने तेरे उसपर,
कुछ ऐसा कहर ढाया होगा,
हो गयी मोहब्बत खुदा को,
जब उसने तुझे बनाया होगा,
भेज कर धरती पर तुम्हे,
वो भी बहुत पछताया होगा,
याद तेरी जब-जब आयी,
आँसु-ए-बारिश बरसाया होगा,
तेरी यादों का दामन सदा थामे,
सीने-ए-ज़िगर से लगाया होगा,
तन्हाई में अकेले इस खुदा ने,
बहुत रोया, चिल्लाया होगा,
खुदा का नाम लोग यूँ ही नही लेते,
मिलने तुझसे वो भी ज़मी पर आया होगा I
                                               - Suresh Kumar
                                                      14/12/11

Friday, December 09, 2011

वो......उनकी अदा......

कुछ यूँ मेरी गली से गुजरे वो,
घर-आँगन इश्क से महकने लगा I
उनकी नज़र मुझ पर यूँ पड़ी,
हुस्न-ए-सागर दिल मे उतरने लगा II
जो ठहरे वो और मेरे करीब़ आये,
इश्क-ए-बारिश में, फ़िसलने लगा I
और पूछा जो हाल-ए-दिल उसने मेरा,
चौखट पर खड़े-खड़े, मै तो मरने लगा II

उनकी चूड़ियों की खनक में इश्क है,
उनकी सांसों की महक में इश्क है,
इश्क की परिभाषा, उनकी हर अदा है,
बिन बोले उनकी हर भाषा में इश्क है II
                                         - Suresh Kumar
                                                09/12/11

Thursday, November 10, 2011

नयन...

रहब़र की राह तकते नयन,
प्रेम-धुन में रमते नयन,
नयनों की भाषा बस वो जाने,
देखन जिनको तरसे नयन I

रति स्वरूप सुन्दर काया,
मनः दशा उनकी माया.
दर्शन-अभिलाषी बस तेरा,
नमन तुम्हे करते नयन I


नयन कभी नही थकते है,
आस लिये नित रहते है,
राहों में रहबर मिल जाये,
खुदा से मन्नत करते है I


इक झलक मेरे दिलबर की मिले,
तब दिल की ये धड़कन भी चले,
आ मिल जा तू इन राहों में,
नयनों से झर-झर नीर बहे I


नीर की हर इक बूँद में,
दिलबर का चेहरा दिख जाता,
दूर बहुत रहबर है लेकिन,
महसूस उन्हे मै कर पाता,
पल-प्रतिपल, इत-उत-चहु ओर,
दर्शन तुम्हरे करते नयन I


रहब़र की राह तकते नयन,
प्रेम-धुन में रमते नयन,
नयनों की भाषा बस वो जाने,
देखन जिनको तरसे नयन II

                                  -----  सुरेश कुमार
                               १०/११/११

Saturday, October 22, 2011

मैं बहुत दूर चला जाऊँगा....

दिल-ए-तन्हाइ , तेरी याद आयी,
लम्हो संग अस्क बहे, भीगे परछाई,
सिकवा-ए-ज़िन्दगी हम करे भी तो क्यों,
ज़िन्दगी ने अक्सर, यही राह दिखायी.


मेरी तन्हाइयों की खबर,
लम्हों-लम्हों को है, उनको नही.
उनकी गली से गुज़रता हर लम्हा,
उन्हे देखता है.
हवा का इक-इक झोंका, जो मेरे करीब़
से गुज़रता है,
वफ़ा-ए-इश्क का मेहमां बन,
उनके घर ठहरता है.
बड़ा नादां, बड़ा ज़ालिम है मेरा दिल-ए-पागल,
हुये बेताब़, उनकी चौख़ट पर,
धड़कता है.


रहमत-ए-खुदा, गर हो, उनके ख्वाबों में,
ज़रूर आऊँगा,
अस्क का इक-इक कतरा उनकी यादों पर,
बहाऊँगा,
वफ़ा-ए-इश्क वो समझे या ना समझे,
अब अफ़सोस नही,
अफ़सोस ये है कि, जब तक वो समझेगी,
मैं बहुत दूर चला जाऊँगा.
मैं बहुत दूर चला जाऊँगा..................!!!

                                           सुरेश कुमार
                                             २२/१०/११






Tuesday, October 18, 2011

लम्हें... जो हसीन हैं...

वो लम्हे भी खुश्बू-ए-इश्क में,
तब्दील हो जाते है,
तुमसे मिलकर, तुम्हे छूकर,
जो मेरे करीब़ आते हैं.
लम्हों का रूख़, अब बदल गया,
इश्क के रंग, जिस्म-ए-रूह,
पर उड़ाते है.


उनकी ख़्वाइश थी कि,
वो मेरा हमसफ़र बनेंगे,
और हमने सफ़र-ए-जिन्दगी,
उनके नाम कर दी.
इतनी मोहब्बत है उनके दिल में,
कि मत पूछो,
अपनी परछाई भी,
उनका गुलाम कर दी.


जिन्दगी इक चाह है,
जिसका तुम बिन अंत है...
मंजिल-ए-कारवाँ तुम संग मुमकिन है,
तुम संग जिन्दगी, अंतहीन है...

                                           सुरेश कुमार
                                            १८/१०/२०११

Tuesday, October 11, 2011

वरना मै था ही नही....

जिन्दगी का हर
लम्हा तुम्हें सौंप दिया,
बस ये सोचकर कि तुम
मेरी जिन्दगी हो.
जी करता है, वक्त के
अंतिम सांस तक
तुम्हे प्यार करूं,
भू की अंतिम
परिक्रमा से परे
प्यार करता रहूँ.
तुम हो, मैं हूँ,
वरना मै था ही नही.


मेरी ख़ामोशियों का शोर
सिर्फ़ तुमने सुना,
महसूस किया,
दिल की अबोध धड़कन
को धड़कना सिखाया.
बिन तुम्हारे तो मेरा
अस्तित्व ही नहीं,
तुम हो, मैं हूँ,
वरना मै था ही नही.


                          सुरेश कुमार
                            ११/१०/११





Wednesday, September 28, 2011

रूप-स्वरूप-दिल-ए-ख्वाइश....

ना अंजन, ना श्रृंगार, अद्भुत तेरी सौन्दर्य छटा,
तन यौवन का चरमबिन्दु, अधर खुले, बरसे घटा,
बंद पलक में निशा बसे, खुली पलक में भोर,
हृदय-मुग्ध करती हो प्रतिपल, इत-उत व चहुँ ओर.[१]


बिन घुँघरू पग अतिशोभित, बिन कंगन ये हस्त,
प्रकृति-अंश समान ये काया, करे सदा मदमस्त,
मनु तुम-पर मन से मरा, इतना सुन्दर रूप,
तुम सावन हो, तुम बरखा, तुम हो रति स्वरूप. [२]


*****************************************


मैं देखूँ इश्क की गलियाँ, मुझे ऐसी नज़र दे दो,
छुपालो अपनी आँखों में, सुकूँ की इक बसर दे दो.
मैं राही हूँ मोहब्ब्त का, मोहब्बत रग में बसती है.
चलो अब साथ बस मेरे, कसम ये हमसफ़र दे दो. [३]


खुश्बू-ए-इश्क के पंछी, चलो हम साथ उड़ जायें,
जहाँ हो अन्त लम्हों का, वहाँ जाकर ठहर जायें,
बसायें आशियान इक, मोहब्बत नाम हो उसका,
हम जीते है मोहब्ब्त में, मोहब्बत में गुज़र जायें. [४]


                                                                                            सुरेश कुमार
                                                             २८/०९/२०११

Sunday, September 11, 2011

तुम बिन मेरी परिभाषा.....














विरह, वेदना, क्रन्दन,
रोता, बिलखता अबोध मन,
अप्रत्यक्ष जीवन,
उत्कंठित नयन,
मृत इच्छा उद्बोधन,
चहु दिशा अप्रसन्न,
मुर्झाया उपवन,
शून्य-तनन-संवेदन,
यथासमय शिरश्छेदन,
मत-भ्रमित अवलोकन,
उत्सावाग्नि चुभन,
अभिलाषा अभिशून्यन,
भावशून्य अध्यर्थन,
पराकष्ठा ठिठुरन,
दिशाहीन अन्तर्मन,
गहन तिमिर संचयन,
सर्वसुख समापन,
हर्षविहीन नव दुल्हन,
आत्म-सुख निरन्तर दहन,
प्राणप्रिये !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
यही है......................
तुम बिन मेरी परिभाषा.

                  सुरेश कुमार
                  ११/०९/२०११

Wednesday, September 07, 2011

गरीबी (ज़ले हर रोज़ बिन शोले).......


गरीबी समाज की बहुत बड़ी मर्ज़ है,इसे बचपन से देखा है.गरीब परिवार में पला-बढ़ा हूँ इसलिये इसे अच्छे से समझ सकता हूँ,पर शुक्रगुज़ार हूँ खुदा का जिसने मुझे इतने महान माँजी और बाबूजी दिये जिनके त्याग और बलिदान की वजह से मैं इस काबिल बना कि आज इस दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहा हूँ. बस खुदा से यही गुज़ारिश है, हे खुदा ! ये दुनिया तुम्हारी औलाद है इस जहां से गरीबी मिटा दे...सब खुश रहें... आमीन...














नयन के नीर, हैं गम्भीर,
सुनाये पीर, बिन बोले.
दहकता दिल का हर कोना,
पड़े हर ज़ख़्म पे ओले.
रगों में दौड़ता इक खौफ़,
बांहें मौत का खोले.
ये दरिया है गरीबी का,
ज़ले हर रोज़ बिन शोले.

है सूखी आँत किस्मत की,
धमनियाँ फ़टती मेहनत की,
ज़ो रोये, अस्क ना बहते,
ना मोल इसके अस्मत की,
ये जीवन है कड़कती ठंढ़,
अधर बस काँपे, ना बोलें,
ये दरिया है गरीबी का,
ज़ले हर रोज़ बिन शोले.

यहाँ भटके, वहाँ भटके,
जले है पेट की खातिर,
पड़े है आँत में छाले,
मिले बस भूख ही आखिर,
गरीबी है बड़ी ज़ालिम,
तमाशा मौत का खेले,
ये दरिया है गरीबी का,
ज़ले हर रोज़ बिन शोले.


खुशी तो इसके हिस्से में,
ना आयी थी, ना है आयी,
गरीबी दु:ख का है साया,
है फ़ंदा इसकी परछाई,
खुदा है आरज़ू मेरी,
मिटा इसको, इसे ले ले,
ये दरिया है गरीबी का,
ज़ले हर रोज़ बिन शोले.

          सुरेश कुमार
          ०७/०९/२०११

Monday, September 05, 2011

है गुरुजन को सत-सत नमन....

समस्त गुरुजन को समर्पित...
(आपका जलाया हुआ दीप आज जगमगा रहा है गुरुजन)..

है गुरुजन को सत-सत नमन,
प्रज्वलित हुआ है जिनके लौ से,
दृष्टिकोण और अंतर्मन.
है गुरुजन को सत-सत नमन.


हाथ थामकर राह दिखाई,
शीर्षलम्ब उद्देश्य दिया,
इत्र-उत्र-सर्वत्र हे गुरुजन,
जीवन को सर्वोच्च किया.
दिया है इन नयनों को तुमने,
दूरदृष्टि का अंजन.
है गुरुजन को सत-सत नमन.


तुम मात-पिता, तुम सखा समान,
हे गुरुजन तुम, प्रेरितिक महान,
देवत्वारोपण तन-मन से,
तुम इश्वर हो, तुम भगवान.
सर्व सफलता तुमको अर्पण,
कहे "सुरेश" यह सत्य कथन.
है गुरुजन को सत-सत नमन.

                           सुरेश कुमार
                            ०५/०९/२०११


Sunday, September 04, 2011

मैं ढूढ रहा उस लम्हे को....
















मैने अभी लिखा नहीं,
जो अंतर्मन को दिखा नही,
मैं ढूढ रहा उस लम्हे को,
जो अधियारों मे छुपा कहीं.

कलम उठाता हूँ लिखने को,
भाव निकल भी आते है.
हस्त कलम संग कम्पित होते,
शब्द उमड़ नही पाते है.
मै सोच रहा उसे प्रतिपल,
जो मुझमें होकर मिला नही.
मैं ढूढ रहा उस लम्हे को,
जो अधियारों मे छुपा कहीं.

कलम ज़वां, स्याही परिपूर्ण,
लेखन अभिलाषा संपूर्ण,
इत-उत बैठूँ लिखने को,
पर हो जाता हूँ शब्द शून्य.
मैं खोज रहा उन शब्दों को,
जो शब्दकोश में है ही नही.
मैं ढूढ रहा उस लम्हे को,
जो अधियारों मे छुपा कहीं.

पग रखता हूँ पगडंडी पर,
पदचिह्नो की आशा लिये.
उस लम्हे को मैं दिख जाऊँ,
उसकी अभिलाषा लिये.
हैरां हो जाता हूँ हरदम,
पदचिह्न मिलते ही नही.
मैं ढूढ रहा उस लम्हे को,
जो अधियारों मे छुपा कहीं.

तुझको पाने की जिद्द है,
तुझमें खो जाने की जिद्द है.
नित-प्रतिदिन जिज्ञासा बढ़ती,
शब्दकोश में लाने की जिद्द है.
कलम उतारू लिखने को,
स्याही उमड़ी संग चलने को,
ढूढ़ लूँगा ऐ लम्हा तुझे,
तुझको लिख जाने की जिद्द है.

                               सुरेश कुमार
                               ०४/०९/२०११


Friday, September 02, 2011

कभी-कभी ही सही...


कभी-कभी ही सही,
मेरे खयालों में आ जाया भी करो.
मेरे सूखे जहां को,
खूश्बू-ए-इश्क से महकाया भी करो.
तेरी परछाई मुझपे हो तो,
खुदको पाक़ समझूंगा.
कभी-कभी ही सही,
बनके घटा, यूँ छाया भी करो.

प्रज्वलित हुआ हूँ,
इश्क की ज्वाला में ऐ हमदम.
जलने दो अंत तक,
इसे यूँ बुझाया भी ना करो.
कांपता हूँ रात-दिन,
तन्हाईयों की ठंढ में,
कभी-कभी ही सही,
धूप-ए-मोहब्ब़त दे जाया भी करो.

तेरा दीदार जिस पल हो,
वो लम्हा मै चुरा लूंगा.
तू मेरा ख्वाब है हमदम,
जिस्म-ए-रूह बना लूंगा.
तुझे गर पा सकूं तो,
खुद को मै भी इश्क समझूंगा.
कभी कभी ही सही,
मुझे इश्क बुलाया भी करो.

                              सुरेश कुमार
                              ०२/०९/२०११

Tuesday, August 30, 2011

हे मानव तुम कौन हो ?????



















मैं मालिक हूँ तुम सब का,
मैने तुम्हे बनाया है.
भेजा अपना अंश समझकर,
पर कुछ और ही पाया है.

चौरासी लाख योनियों में,
उच्च श्रेणी है तुम्हे दिया.
पर कर्तव्य तुम्हारे ऐसे,
तुमने खुद को तुच्छ किया.

नित-प्रतिदिन बदलाव तुम्हारा,
मेरे शोक का कारण है.
अब तुम ऐसी मर्ज़ बने,
जिसका ना कोई निवारण है.

इस धरती की गोंद में,
तुम फले-फूले, इंसान बने.
आज ये धरती कराह रही,
तुम कैसे हैवान बने ?

प्रकृति का ये आंचल,
क्षण-प्रतिक्षण तुमपर रहा.
आंचल भी इसका फाड़ रहे,
हे मानव तुमने क्या किया ?

अपने हर जनम में मैंने,
असुरों का संहार किया,
मैने मानव तुम्हे बनाया,
तुमने असुरों का रूप लिया.

कभी सुनामी, कभी भुकम्प,
ये मेरे ही अवतार है,
श्रृष्टि खत्म तुम्हारी होगी,
शुरू मानव-संहार है.

जीवन-मृत्यु कथन सत्य,
शायद तुम ये भूल रहे.
कितने भूखे- कितने प्यासे,
अपने ही आप को लील रहे.

गर ना सुधरे, गर ना संभले,
औंधे मुह गिर जाओगे.
प्रकृति भी लात मारेगी,
धरती पे जगह ना पाओगे.

सबकुछ ज्ञात तुम्हे है फिर भी,
बीभत्स रूप लिये मौन हो.
मैने तुमको क्या बनाया,
हे मानव तुम कौन हो???

                            सुरेश कुमार
                            ३०/०८/२०११

Thursday, August 25, 2011

सिर्फ़ तुम..सिर्फ़ तुम हो...


















प्रेमरुपी किताब,
के हर अध्याय में,
सिर्फ़ तुम..सिर्फ़ तुम हो...

जीवनरूपी समुद्र,
की हर बूँद-हर प्यास में,
सिर्फ़ तुम..सिर्फ़ तुम हो...


मेरे प्रेम-पाठ,
मेरे प्रेम-पंक्ति,
मेरे प्रेम-वाक्य,
मेरे प्रेम-शब्द,
मेरे प्रेमाक्क्षर,
मेरे प्रेमपृष्ठ में,
सिर्फ़ तुम..सिर्फ़ तुम हो...

मेरे मानसिक तरंगों
की गति,
तुम पर ठहरती,
अपलक निहारती,
सदैव स्मरण करती,
मेरी अभिलाषा, उल्लास,
हृदयावास में,
सिर्फ़ तुम..सिर्फ़ तुम हो...

तुम मन-स्मृति का केन्द्र बिन्दु,
प्रेम-प्राप्य, तुम प्रेम यथेष्ठ,
निरवधि तक प्रेमकाल में,
प्रिये !!!,
सिर्फ़ तुम..सिर्फ़ तुम हो...
                      
                           - सुरेश कुमार
                             २५/०८/२०११

Tuesday, August 23, 2011

सदा तुम नज़र आये...

अंतर्मन की दिव्यदृष्टि में,
                           सदा तुम नज़र आये.
मेरी रचना, हर काव्यपंक्ति में,
                           सदा तुम नज़र आये.

जब मन की रचना अपने पथ से,
                           विकृत व विफल हुई,
अंधियारों मे घुट-घुट कर ये,
                       नि:शब्द व असफल हुई,
शब्दकोश और मार्गदर्शिका,
                    बनकर तुम प्रियवर आये.
मेरी रचना, हर काव्यपंक्ति में,
                           सदा तुम नज़र आये.


प्राण-प्रिये तुम प्राणेश्वरी,
                      तन मन में कंठस्थ हुई,
तुम्हे सोचकर कलम उठे,
              तुम हर रचना मे व्यक्त हुई,
अधर खुले या बंद हुए,
                         बस तेरे ही स्वर आये.
मेरी रचना, हर काव्यपंक्ति में,
                           सदा तुम नज़र आये.


तुम, तुम ना रही, मै, मै ना रहा,
          तुम मुझमें बसी, मै तुझमें बसा,
तुम, मै हो गयी, मै तुम हो गया,
      "दो जिस्म मगर एक जान है हम"
हो सार्थक ये उदाहरण,
                    जब-जब ये हम पर आये,
मेरी रचना, हर काव्यपंक्ति में,
                             सदा तुम नज़र आये.

                                        - सुरेश कुमार
                                           २३/०८/२०११

Thursday, August 11, 2011

मृत्यु एवं कालपुरुष...


धुंधली काली रातों में,
अन्जान सख्श़ को देखा..
हाथ में उसके खंज़र था,
और मृत्यु की रेखा.


  वो जिज्ञासु, मृत्यु का,
उसकी अभिलाषा बाहुल्य.
पूर्णपदी वो जीव-हरण का,
कालपुरुष समतुल्य.


मृत्युवंश का वो शासक,
जीवन सम्पादित करता था.
सर्व भुजायें खुली हुई,
जीवन आगोश में भरता था.

इत्र-उत्र-सर्वत्र,
जाने वो किसको ढूंढ रहा.
मृत्यु-नृत्य करने वाला,
जाने वो किसको घूर रहा.

वह कालपुरुष अंधियारे मे,
जीव शून्य करने आया.
उस मृत्युप्रिय का पता नही,
किस-किस को हरने आया.

वह जीव-हरण में निपुण,दक्ष,
कालचक्र दौड़ाता था.
जीवन-पथ पर खड़ा हुआ,
मृत्यु मार्ग दिखलाता था.

                                             सुरेश कुमार
                                             ११/०८/२०११


Wednesday, August 10, 2011

"आज फिर बारिश हो रही है"
















"एक प्रेमी को उसकी प्रेमिका के याद मे समर्पित कविता.."



प्रिये आज फिर बारिश हो रही है,
तुम्हारा चेहरा बारिश की,
हर एक बूँद मे नज़र आ रहा है.
जी करता है,
इन बूँदों को मुट्ठी में समेट लूं,
कह दूँ इन बारिश की बूँदों से,
बस जाओ
मेरे दामन में,
मेरे पागल मन में,
मेरी हर सांसों में
मेरे रग रग में,
जब तक तुम्हारा जी चाहे,
मेरे मनरूपी धरा पे बरसते रहो.
तुम्हारी हर एक बूँद मुझे,
मेरे प्रियवर की याद दिलाती है.
हमारी पहली मुलाकात की
तुम्ही तो साक्षी हो.
बारिश तो मेरा दामन थामे हुई थी,
पर शायद, गगन और धरा मे,
कुछ अनबन हो गयी,
गगन ने अपनी विरासत बारिश
को वापस बुला लिया.
बारिश गयी,
मानो मेरे मन के आँगन में
बिजली गिर पड़ी,
तुम्हारी यादों का पुल
कम्पित हो उठा,
उसके स्तम्भ हिलने लगे,
मैने गगन से गुहार लगायी,
कहा, हे गगन तुम भी तो धरा
से प्यार करते हो,
तुम्ही हो जो इसकी भावनाओ,
संवेदनाओ को समझ सकते हो,
फिर ऐसा क्यों,
ये धरा प्यासी है
और इसकी प्यास बुझाने वाला,
उससे मोहब्ब्त करनेवाला,
ये गगन रूष्ट है, सोया है या
संवेदनाविहीन हो गया है,
गगन को शायद मेरी बातों में
मेरी मोहब्ब्त का दर्द,
एकदम साफ दिखाई दिया,
उसे भी उसकी मोहब्ब्त धरा की
याद आयी..और वो पुनः धरा
से मिलने आया..
प्रिये अब फिर बारिश हो रही है,
और तुम्हारा चेहरा बारिश की,
हर एक बूँद मे नज़र आ रहा है.
                                   सुरेश कुमार
                                   १०/०८/२०११



Tuesday, August 09, 2011

मैं प्रेम का प्यासा पंछी...



मैं प्रेम का प्यासा पंछी, 
मेरे अरमां मचलते रहे,
मौसम-ए-जुदाई की आग में,
अरमां संग जलते रहे.

बूँद-बूँद अगन टपके,
बूँद-बूँद मन भी तरसे,
हमनवां की आस में नयन,
बिन बादल बरसते रहे.

हवा का जो इक झोंका,
दिलबर की आहट दे जाता,
सुबह, दुपहरी, शाम,
रहबर की राह तकते रहे.

लम्हों के मायाजाल में,
वो फ़स गये, हम फ़स गये,
होकर हमसे दूर,
वो रोते रहे हम तड़पते रहे..

बैरी ज़माने का डर,
उन्हे भी था, हमें भी था,
रोज़ अकेले सपने में
हम उनसे मिलते रहे.
वो दिये सा जलते रहे,
हम मोम सा पिघलते रहे.

हुश्न-ए-दीदार, मेरे यार का,
जब हुआ तो मत पूछो,
मौसम-ए-इश्क की बारिश में,
हम साथ-साथ फिसलते रहे.

                                                                                              सुरेश कुमार
                                                                                               ०९/०८/२०११



Monday, August 08, 2011

मेरे बिखरे सपने...




रात को मेरे बिखरे सपने,
तड़पते,बिलखते, रोते है,
सपनो को भी नींद ना आती,
तन्हाइ में क्रुन्दन करते है.

जब ये घनी काली रातें
बीभत्स रूप दिखलाती है,
सहमें सपने, बिखरे सपने,
मन के कोने में छिप जाते है.

सिसक-सिसक निरंतर रोते,
मेरी निद्रा से कहते,
उन्मूलन करो, विकट समस्या,
अप्रिय लगती है काली राते.

निद्रा, सपने से कहती,
निर्मुक्ति करो काली रातो को,
जीवन का ये हिस्सा है,
काली रातों से क्यों नही लड़ते हो ?

भय ना करो, निडर बनो,
ये तुम्हारा आत्मसात करेंगी,
अथाह हिम्मत है तुममें,
निष्क्रियता से दूर हटो.

निद्रा ने सपने को,
उसका महत्व बताया.
उसकी अभिषंगी आदत को,
कोशो दूर भगाया.

सपने ने निद्रा को गले लगाया,
काली रातों से लड़ने को,
प्रतयायित हुआ,अभ्यस्त बना.

समय-चक्र परिवर्तित हुआ,
काली रातें अब सपने से,
सहम जाती, निकट नहीं आती है,

सपने निद्रा संग,
कभी घर, कभी आंगन,
कभी छत पर टहलते है..

अब ये मेरे बिखरे सपने,
निद्रा से यूँ सहज जुड़ जाते है,
मधुर मिलन के गीत,
तन्हाई मे भी गुनगुनाते है....

                                                                                         
                                                                                           सुरेश कुमार
                                                                                           ०८/०८/२०११

Sunday, August 07, 2011

वो रचना तुम हो.....



जिन्दगी की किताब में
नया अध्याय जोड़कर,
 हमेशा खुश रहता हूँ,
दौर ये आ गया कि मेरी जुबां पे
तुम्हारा नाम अक्सर आ जाता है,
एकांत में सोचता हूँ मैने ऐसी रचना,
कैसे रची जो मेरे मानसपटल में हमेशा
छायी रहती है.
तुम्हरा हर एक शब्द मेरे दिलो दिमाग
में गूँजता रहता है,
मुझे अपने प्रवाह में तेजी से बहा लेता है
और मै सहज बहता चला जाता हूँ,
अपने आप को भुलाकर मै कुछ
यूँ हो गया हूँ,
मानो, मैने गर जन्म लिया तो उसी,
रचना के लिये जो सिर्फ,
मेरी कलम से ही लिखी जा सकती है,
उसकी संवेदना, उसके भाव सिर्फ़ मै समझ
सकता हूँ.
उसे सिर्फ मै पढ़ सकता हूँ.
वो कलम मै, स्याही हमारी मोहब्बत
और प्रिये वो रचना तुम हो,
जिसे मैने खुद लिखा है.

                                                                                                 सुरेश कुमार
                                                                                                 ०७/०८/२०११




सुरेश-ए-शायरी...
























ग़ुस्ताख़ियों के शमां में, बरबादियों का ज़श्न हुआ,
महफ़िल-ए-बेवफ़ाई में, हर लम्हा अश्क से बयां हुआ.
जो इक ग़ुस्ताख़ नज़र ने, हाल-ए-दिल को पढ़ लिया.
जश्न-ए-बरबादी, महफ़िल-ए-इश्क में बदल गयी.
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ऐ दिल-ए-नादां, तू बेवफ़ा तो बन,
वो आयें तुझे मनाने, कुछ यूँ खता तो कर,
इश्क-ए-नाराज़गी में प्यार, बेशुमार होता है,
इश्क-ए-नाराज़गी का यूँ, ऐसे दीदार कर,
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उनकी मदहोश़ नज़रें कातिल हैं, मालूम था,
पर इतनी कातिल कि मेरे हर लम्हों पर वार करे,
उनसे नज़रे मिली तो खुद-ब-खुद समझ गया.
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दिल-ए-ख्वाइशें सिर्फ़ तेरी इनायत करती है,
मोहब्बत-ए-जुनूं को खुदा का दर्ज़ा देती है.
इन आंखों को सिर्फ़, रहगुज़र का दीदार हो,
जिस्म-ए-रूह, तुझसे बेइंतहां मोहब्बत करती है.


                                                          सुरेश कुमार
                                                           ०२/०८/२०११

Saturday, August 06, 2011

मैं अफ़सोस नही करता...
























अपने इस पागल मन के इर्द-गिर्द, आग लगा दी मैने,
                 पर अफ़सोस नहीं करता,
   उसकी रोशनी, मेरे मन के अंधेरों को चीरती है.


अपनी प्यासी रूह को, बंजर में द़फ़ना दिया मैने,
                पर अफ़सोस नही करता,
मौसम-ए-बारिश की खुश्बू, इस रूह को सुकूं देती है.


समंदर तुझे, स्वयं को समर्पित कर दिया मैने.
              पर अफ़सोस नहीं करता,
तेरी हर एक बूँद पीने की, मुझमे ख्वाइश जो है.


ये काल चक्र मुझे अपने संग ले जयेगा, पता है,
              पर अफ़सोस नहीं करता,
अपने हर लम्हे को जिंदादिली से जीता जो हूँ


     वक्त मैं तेरे आगोश में जीता और मरता,
गर कहीं गिरता, खुद सम्भलने की हिम्मत करता,
         जिन्दगी तेरा मोल पता है मुझको,
अतः मैं अफ़सोस नही करता, मैं अफ़सोस नही करता.


                                                                 - सुरेश कुमार
                                                                    ३१/०७/२०११

Thursday, August 04, 2011

त्राहिमान..."सर्वदा सच"..























तू जला, जला और संपूर्ण रूप से जल जायेगा,
                                     गर अहंकार ने तेरी तरफ़ घूर कर देखा.
तेरा अस्तित्व मिटा, मिटा, और मिट जायेगा,
                                                गर क्रोध ने तेरे घर, पनाह लिया.
तेरी उम्मीदें घुट-घुट कर मरी, मरी, और मर जायेंगी,
                                                गर कुसोच पर तूने, अमल किया.
तेरे दिल में त्राहिमान त्राहिमान मच जायेगा,
                                  ये तूने क्या किया ? ये तूने क्यों किया ?


तेरी किस्मत की टहनियां टूटी,टूटी, और टूट जायेंगी,
                                        गर मेहनत ने तेरा दामन छोड़ दिया.
मानवता तुझसे रूठी,रूठी और रूठ जायेगी,
                                               गर तूने घृणा को स्वीकार लिया.
जीवन सुख तूने खोया, खोया और खो देगा,
                                           गर मात-पिता का बहिस्कार किया.
तेरे दिल में त्राहिमान त्राहिमान मच जायेगा,
                                 ये तूने क्या किया ? ये तूने क्यों किया ?


तेरा मन अपंग हुआ,हुआ और हो जायेग,
                                       गर लालच ने तुझे, चहुओर घेर लिया.
सोचता क्या है, ये जीवन, तूने खुद निरर्थक बना दिया.
                          जिन्दगी हमेशा तेरा साथ देना चाहती थी..
                                 तूने ही इसका साथ नहीं दिया, नहीं दिया.


                                                                             - सुरेश कुमार
                                                                                 ०४/०८/२०११

Wednesday, August 03, 2011

ख़ामोश अल्फ़ाज़...
















तेरे ख़ामोश अल्फ़ाज़,
         अक्सर उस मोड़ पर टकरा जाते है,
                              जिस मोड़ पर तू मुझे, तन्हा  छोड़  गया है...

दिल-ए-ख़्वाइश,
         तुझसे उसी मोड़ पर टकराऊं,
                              कम्बख़्त दिल  है कि, धड़कना भूल गया है...


वो मासूम रातें, गुमशुम अकेली है,
                        अक्सर रोया करती है,
                                तेरी यादों का झोका जो उन्हे छू लेता है...


तेरा जाना, जिन्दगी का जाना,
                   धड़कनो का रेगिस्तां मे धड़कना,
                                        सांसों का दफ़न हो जाना लगता है...


तेरे ख़यालात रगों में दौड़ रहे हैं,
                  इक पल भी तुम्हे भूल पाना,
                                            रूह का ख़त्म हो जाना लगता है...


ऐ खुदा !!! मेरी पैदाइश,
            इस जहां में मुकम्मल कर दे,
                      उसी मोड़ पर उससे मिला दे,
                                  वरना ये जीना भी, मर जाना लगता है...


Monday, August 01, 2011

एकांत में ये मन.....



                                         
                                           सुबह क्यों आज़ ना आयी, मेरे घर पे ये तन्हाई,
                                           कहीं मेरी खुशी ने, उसे मीलों दूर खदेड़ा तो नहीं,
                                          जो समझा अपनी और अपने वक्त की अहमियत,
                                          तो एकांत में ये मन, अक्सर मुस्करा देता है......१

                    
                    चिलचिलाती गर्मी में भी,  ठिठुरने लगा था,
                     मेरी उम्मीदें, संकीर्ण हो गयी, कहीं खो गयी,
                     जो उम्मीद की रोशनी, मेरे मन पर पड़ गयी.
                     तो एकांत में ये मन, अक्सर मुस्करा देता है......२


                                          मेरे इर्द-गिर्द सागर, फ़िर भी प्यास ना बुझती,
                                          भूल गया, मेरी प्यास, ओस की बूंदें बुझाती हैं,
                                          जो ओस की बूंदों को मुट्ठी में भर लिया,
                                          तो एकांत में ये मन, अक्सर मुस्करा देता है......३

                   
                   वक्त की मार से सभी रोते, मैं भी रोता,
                    हो गया अनभिज्ञ, उसी कतार में शामिल होता,
                   जो आज़, सुकून की, इक कतार बना दी,
                   तो एकांत में ये मन, अक्सर मुस्करा देता है......४