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Wednesday, June 17, 2020

हास्टल में पिक्चर


काबे सुरेशवा, आज पिक्चर देखय क मन करत हौ बे...चल टी.वी. और सी.डी. प्लयेर किराये पर लियावल जाय..I ये बात सुनते ही मेरे भी कान खड़े हो गये.. बात सन २००३ की है जब मैं बी.एस.सी. द्वितीय वर्ष में था..I ब्रोचा छात्रावास, कमरा नं १७८ डी. ब्लाक में रहता था.. I परीक्षा की घड़ी नजदीक थी..I पढ़ाइ चरम पे थी..I तभी मेरे एक मित्र राना को पिक्चर देखने का भूत सवार हुआ..I उस समय हंगामा, चलते-चलते, कल हो ना हो, मुन्नाभाइ एम.बी.बी.एस जैसी फिल्में खूब चल रही थी..I उनका गाना भी खूब गाते थे हमलोग..I खैर जब मित्र राना का मन बन ही गया था तो पिक्चर  देखना ही था...I उन दिनों करौन्दी गेट खुला करता था और हमलोग करौंदी से किराये पर टी.वी. और सी.डी. प्लयेर लाकर फिल्मों का आनन्द ले लिया करते थे..I परीक्षा का वक्त था और प्राक्टर वाले बाबू लोग भी थोड़ा सख्त थे...रिक्शे पर जो सामान अंदर आये या बाहर जाये, वो लोग अक्सर चेक किया करते थे..I इस बात से हमलोग अवगत थे..I मैने राना से कहा..मालिक मन त हमरव करत हौ पिक्चर देखय क लेकिन टीविया अंदर कैसे लियावल जायी..I और सारे ओकर किराया १५० रू. हौ..पैसा बा एतना..I राना थोड़ा सोचा फिर बोला..अबे हमलोग अकेले थोडे ही देखेंगे..मिश्रा, भोभो, ढीलू, कक्का, मल्लू और सूर्या भी तो हैं..I सबसे चन्दा लेते हैं.. I ये सब मेरे परम मित्र हैं और इन सब की विशेषता किसी और दिन बताउंगा..I खैर हमलोग आपस में बात किये और पैसे का प्राब्लम साल्व हो गया..I अब रही बात टी.वी. और सी.डी. प्लयेर अंदर लाने की...कक्का जिन्हे हम आज भी कक्का ही बुलाते हैं..उन्होने अपने ग्यान चक्षु खोले और अचानक बोले,  अबे मिश्रा तुम्हारे रूम में कार्टून है न उसको खाली करके मोड़ लो..और १०-१२ किताबें और एक चद्दर अलग से हांथ में लेकर तुम और सुरेशवा करौन्दी पहुंचो हमलोग साइकल से आ रहे हैं..I हमने वैसा ही किया..क्योन्कि कक्का हमारे बड़े चतुर दिमाग के है और उनकी काबिलियत पे शक हमें आज भी नही है..I मै और मिश्रा रिक्शा से पहुंचे..मेरे बाकी दोस्त साइकिल से करौन्दी " नन्हे टी.वी. सेंटर" वाले के यहां पहले ही पहुंच चुके थे..I हमने उस दिन तीन फिल्में सेलेक्ट की तभी मिश्रा बोला "भैया कोइ नयी भूतहा मूवी है"... नन्हे बोला..नही भैया  एक आयी थी "प्यासी डायन" लेकिन अभी थोड़ी देर पहले एक लड़का लेकर चला गया...I बाकी जो है उ तो आप पहिले ही देख चुके हैं.. उस समय मिश्रा का चेहरा देखकर ऐसा लगा जैसे शेर के पंजे से कोइ शिकार छीन लिया हो...I वो बड़बड़ाने लगा..हम कह रहे थे हमको साइकल से आने दो हम पहले आकर बढ़िया बढ़िया मूवी सेलेक्ट कर लेते..साला इतना दिन बाद टी.वी. और सी.डी. प्लयेर ले चल रहे हैं कौनव बढ़िया मूवी ही नही है..I जाओ देखो तुम लोग..मै नही देखुंगा..दरअसल मिश्रा जी को भूतही मूवी नही..उस मूवी के कुछ दिल मचला देने वाले सीन बहुत अच्छे लगते थे..वो इतनी बार उसे रीवाइंड करके देखता था कि हमलोग खिसिया जाते थे..I उसके बाद हम कमरे से बाहर..मिश्रा जी कमरे के अंदर अकेले डायनों के साथ दहला-पकड़ खेलते थे..I मिश्रा का गुस्सा देखकर कक्का खिसिया गये..बोले..ठीक है तुमको नही देखना है तो मत देखो चन्दा वाला पैसा तुमको वापस नहीं मिलेगा...और नन्हे से बोले...बाबू कल नौ बजे तक तुमको तुम्हारा टी.वी. और सी.डी.प्लेयर वापस कर देंगे I कक्का ने कार्टून सेट किया, नीचे टी.वी. और सी.डी.प्लेयर...उसके ऊपर सारी किताबें और चद्दर से ढककर मेरे साथ रिक्शे में बैठकर हास्टल की ओर चल दिये I बाकी दोस्त पहले ही हास्टल में आकर माहौल बनाना चालू कर दिये थे..I राना ने सबका खाना मेस से रूम पर ही मंगा लिया था..I मै और कक्का आराम से रिक्शे से छात्रावास की ओर आ रहे थे..I जैसे करौंदी गेट पर पहुन्चे प्राक्टर वाले साहब ने रोक लिया...पूछा..क्या है इसके अंदर...?? एक बार मैं थोड़ा सकपका गया..कक्का पहले ही हमको बोल दिये थे... तुम बस शांत रहना..I मै चुपचाप प्राक्टर वाले साहब को देख रहा था और मन ही मन सोच रहा था...आज अगर पकड़ाये..बहुत कुटायेंगे..I तभी कक्का बोले...किताबे हैं सर इसमें..मेरे भैया रूम खाली कर के जा रहे थे तो जो उनकी पुरानी किताबें थी वही लेने गये थे...I फिर मेरी ओर देखते हुए कक्का बोले...सुरेश..सर को कार्टून खोलकर दिखादो...I साला मैं कक्का का कान्फिडेन्स देखकर चकित रह गया..I मैं कपकपाते हाथों से चद्दर हटाकर कार्टून खोलकर..ऊपर की दो मोटी किताबे प्राक्टर चचा को दिखाइ..I वो बोले बड़ी मोटी-मोटी किताब है...बहुत अच्छे बेटा..ऐसे ही मन लगाकर पढ़ो..ठीक है जाओ..I जैसे ही उन्होने बोला जाओ...ऐसा लगा रिक्शावाले से रिक्शा छीनकर झट से हास्टल पहुंच जाउं...I उस दिन मैने कक्का से सीखा..यदि झूठ बोलकर आपका और आपके घनिष्ठ मित्रों की रात अच्छी गुजरने वाली हो तो...झूठ बोल देना चाहिये..I खैर हमलोग हास्टल पहुंच गये...सबका खाना पहिले से ही मेरे रूम में आ चुका था..I टी.वी. और सी.डी. प्लयेर सेट हुआ..हम खाना खाते-खाते, आवाज धीमी कर पिक्चर देखने लगे..I हम ८ लोग  चोरी से पिक्चर देख रहे थे..बाकी के छात्र पढ़ाइ कर रहे थे..I रात के १० बजे से पिक्चर शुरू हुइ और सुबह के ६ बजे तक हमने ३ फिल्में देख डाली.. I मिश्रा जी को नींद आ रही थी तो दूसरी फिल्म के बीच में ही सोने चले गये..I लगभग ६:३० बजे हमलोग भी सो गये..I अब मन थोड़ा हल्का हुआ था..उठने के बाद जम कर पढ़ाइ करेंगे यही सोचकर सो गये...I हमारे प्यारे मिश्रा जी जिनसे "प्यासी डायन" छूट गयी थी..सुबह ८ बजे ही नन्हे के यहां पहुंच गये...और उसकी सी.डी. ले आये भाइ साहब...I मेरे कमरे से टी.वी. और सी.डी. प्लयेर लेकर जाने लगे...कक्का उठ गये...उन्होने मिश्रा से पूछा.."कहां  टी.वी. और सी.डी. प्लयेर लेकर जा रहे हो बे ??" मिश्रा जी बोले..नन्हे को लौटाने जा रहा हूं..तुम लोग सो जाओ.....I और फिर मिश्रा जी ने अकेले अपने रूम में  "प्यासी डायन" देखी..I उस दिन मिश्रा से एक बात सीखी...जिस चीज का सौक हो..उसे पूरा जरूर करना चाहिये...I हमलोग लंच के समय सो कर उठे...देखा तो मिश्रा जी कुटिल मुस्कान से हमलोगों की तरफ़ देख रहे थे..I फिर अचानक से बोल पड़े...अबे जल्दी से लंच वंच करलो, तुम सबको एक सरप्राइज देना है....हमलोग सोचे साला केमेस्ट्री का कोइ पेपर जुगाड़ किया है..क्योंकि अगली परीक्षा उसी कि थी..I खैर हमसब फ्रेश होकर, नहा-धोकर मिश्रा के रूम पर पहुंचे...देखे तो मिश्रा जी टी.वी. और सी.डी. प्लयेर सेट करके, प्यासी डायन का एक दिल मचला देने वाला सीन पाज किये थे, हमलोग समझ गये...साला अकेले बाकी का पैसा नही देना चाहता इसलिये हमको भी दिखायेगा फिर हम्हीं से चन्दा लेकर टी.वी. और सी.डी.प्लेयर वापस करेगा....I और हुआ भी वही...I हम सबने हसते हुए "प्यासी डायन" साथ मिलकर देखी...सच कहूं तो बड़ा मजा आया....I अब काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से जाने के बाद हम सब अच्छी जगह नौकरी कर रहे हैं..अच्छा जीवन-यापन कर रहे है...I "प्यासी डायन" जैसी अनगिनत फिल्में आसानी से उपलब्द्ग हैं देखने के लिये...मगर हास्टल में जिस तरह से हमने पिक्चर देखी....वो आज भी याद है..और हम जब भी बात करते है...उन सब क्षणों को याद करके खूब ठहाके लगाते हैं...II

डा. सुरेश कुमार

Monday, April 22, 2013

शहर-ए-बनारस.......


हर--बनारस...
बसती है ज़वां रूह, हर--बनारस में,
मिलता दिल--सुकूं, हर--बनारस में,
विद्या की राजधानी, बसते हैं ब्रह्म-ज्ञानी,
इतिहास है पुराना, पहचान है पुरानी,
देवों की है ये नगरी, अमृत यहां का पानी,
रहते हैं महादेव, हर--बनारस में,
गंगा बहे सदैव, हर--बनारस में,
कुछ आम नहीं है, सब खास यहां है,
जीवन सपन सलोना, एहसास यहां है,
मस्ती का शहर है, ये घाटों का शहर है,
सुबह-ए-बनारस में, सब खुशियों का बसर है,
जन-जन की है ये मंज़िल, यह मोक्ष नगर है,
मणिकर्णिका का द्वार, हर--बनारस में,
मृत्यु-मोक्ष-मार्ग, हर--बनारस में,
बसती है ज़वां रूह, हर--बनारस में,
मिलता दिल--सुकूं, हर--बनारस में II
- सुरेश कुमार

Monday, February 25, 2013

I/Me/Myself...


दिल काफ़िला...


कारवां गुज़र चुका था, मंज़िलें थी गुमशुदा.........
वक्त की मज़ार पे, अस्कों में डूबा था लम्हा.....
रास्ते मायूस थे कि, हमसफ़र भी ना मिला.......
थी डगर वीरान सी, गुम हुआ दिल काफ़िला......I
शुक्र है उस वक्त का, खुदपर यकीं ये जब हुआ..
है खुदा तू साथ मेरे, क्या मिला और क्या गया...
वक्त को मंज़ूर कर, लम्हों की उंगली थाम ली...
ज़िन्दगी, रंगीन चादर ओढ़े हुए दिल काफ़िला...II
***************************************************
                                               S.Kumar.........

Monday, December 24, 2012

दरिन्दे...

 
"You, 23 yrs girl...I am sorry that I can't do anything for u from ur level...but from my level I can pray to God....Almighty God ! give her all ur strength to be normal" this poem is for u (23 yr old girl)....same on delhi gang rape....

Thursday, December 06, 2012

दिल के करीब....

 
 सूखे है ख्वाइशों के पत्ते,
मेरी मोहब्बत की शाख़ के,
जो तू इन्हे छू ले, तो इनमें,
हरियाली छाये I
हूं फिरता अज़नबी सा,
तेरे अपने शहर में,
जो तू अपनी चौखट पर बुलाले,
तो मेरा घर बस जाये II
**********************
मेरी आंखों में एक समंदर बसता है,
जिसकी लहरों में सिर्फ़,
तेरा चेहरा दिखता है,
जो हुए कभी उदास तो,
मेरा चेहरा पढ़ लेना,
कोइ है जो सिर्फ़,
तुमपे मरता-मिटता है I
लोगों की नादानियां तो देखो,
मेरी तन्हाइयों को इश्क का दर्ज़ा देते हैं,
उन्हें पता ही नही, इश्क से भी परे,
कहीं इस ज़हां में, तेरा-मेरा रिश्ता पलता है II
************************************
                           - S.Kumar
      
 

 

Monday, August 13, 2012

यादों के परिन्दें....


मेरी यादों के परिन्दों का आशियां,
तेरा ज़हां है I
तू ही इनकी ज़मीं, तू ही इनका,
आसमां है I
इन्हें अपने से दूर, कभी मत करना,
वरना लोग पूछेंगे,
वो परिन्दें कहाँ है, वो परिन्दें कहाँ है I
---------------------------Suresh Kumar

Monday, March 26, 2012

वह अपने घर चला............

चुप्पी के घाट पर,
मौन की नौका लिये,
तन्हा लहरों संग,
इक गुमनाम शहर चला,
वह अपने घर चला, वह अपने घर चला I


शून्य से शिखर की,
अब कोई ख्वाइश नहीं,
जीवन की सप्तरंगी चाहतों की,
अब कोई नुमाइश नहीं,
सर्व-रस समेटे,
इक ऐसी डगर चला,
वह अपने घर चला, वह अपने घर चला I


जिस आँगन में फ़ूला, फ़ला,
जिन रस्तों पर दौड़ा, चला,
जिन गलियों में गाये गाने,
वो आँगन क्यों सूना पड़ा,
जो पूछा रोती आँखों से,
दरिया आँसू का बह चला,
वह अपने घर चला, वह अपने घर चला I

मंजिल तेरी, मंज़िल मेरी,
कह रही चिघ्घाड़े सुन ज़रा,
ना रहे गुमान तनिक भर भी,
जाना सबको है एक जघा,
जब ज़ीवन है, जी भर के जी,
क्या सोचे इत-उत-यहाँ-वहाँ,
जिसे देख रहा वो मिट्टी है,
वह कहाँ चला, वह किधर चला,
वह अपने घर चला, वह अपने घर चला I


                                           सुरेश कुमार
                                           २६/०३/१२

Saturday, January 21, 2012

ज़िन्दगी.....एक खोज़.....

ज़िन्दगी तू क्या है ?
कभी दर्द-ए-दिल,
कभी दर्द-ए-दवा है,
ऐ ज़िन्दगी तू क्या है?
अपनी बनायी राहों पर,
कभी दौड़े तू, कभी रूके,
अपने वसूलों की ख़ातिर,
खड़ी रहे तो, कभी झुके,
जिसकी दिशा समझ ना पाया,
तू इक ऐसी हवा है I
ज़िन्दगी तू क्या है ?
***********************
अब इन सपनों की नगरी में,
कुछ ख्वाब तेरे कुछ ख्वाब मेरे है,
अतीत के पन्नों मे दबी प्रेम-पंक्ति पर,
प्रेमयुक्त लाल स्याही के घेरे है,
शब्दों को कुरेद कर ज़ेहन में बसा लिया,
जिनमें से कुछ शब्द तेरे और कुछ मेरे है I
*********************************
ऐ शाम-ए-ज़िन्दगी,
अब सूरज ढल चला,
जीवन की धुंधली राहों पर,
खुद का भी ना पता,
आँखों में समन्दर लिये फ़िरते है,
खुद की तलाश में,
ऐ राह-ए-ऱकीब,
मंज़िल है गुमशुदा I
       सुरेश कुमार.......
        २१/०१/२०१२

Wednesday, December 28, 2011

अधूरापन.....

क्यों दिखता है ये अधूरापन ?
पर्वतों से गिरते झरनों के पानी,
आगे बढ़ते ही नही, थम जाते है,
हवायें बहती है, मेरे करीब आती नही,
दिये जलते है पर घर-आँगन में अंधेरा
छाया है, इक सन्नाटे की आवाज़
मेरे कान के पर्दे को चीर रही है,
मेरी चीखें मुझ तक ही गूँज
रही है, किसी को सुनाई नही देती,
मेरी परछाई कड़क धूप में मेरे
संग नही, अदृश्य है,
समंदर के किनारे दौड़ता हूँ पर
मेरे पदचिह्न दिखते ही नही,
ये कैसा शून्य-तनन है संवेदन ?
बेज़ान धड़कती क्यों धड़कन ?
क्यों दिखता है ये अधूरापन ?
                                  सुरेश कुमार
                                     २६/१२/११







Wednesday, December 14, 2011

वो भी ज़मी पर आया होगा.....

खूबसूरती ने तेरे उसपर,
कुछ ऐसा कहर ढाया होगा,
हो गयी मोहब्बत खुदा को,
जब उसने तुझे बनाया होगा,
भेज कर धरती पर तुम्हे,
वो भी बहुत पछताया होगा,
याद तेरी जब-जब आयी,
आँसु-ए-बारिश बरसाया होगा,
तेरी यादों का दामन सदा थामे,
सीने-ए-ज़िगर से लगाया होगा,
तन्हाई में अकेले इस खुदा ने,
बहुत रोया, चिल्लाया होगा,
खुदा का नाम लोग यूँ ही नही लेते,
मिलने तुझसे वो भी ज़मी पर आया होगा I
                                               - Suresh Kumar
                                                      14/12/11

Friday, December 09, 2011

वो......उनकी अदा......

कुछ यूँ मेरी गली से गुजरे वो,
घर-आँगन इश्क से महकने लगा I
उनकी नज़र मुझ पर यूँ पड़ी,
हुस्न-ए-सागर दिल मे उतरने लगा II
जो ठहरे वो और मेरे करीब़ आये,
इश्क-ए-बारिश में, फ़िसलने लगा I
और पूछा जो हाल-ए-दिल उसने मेरा,
चौखट पर खड़े-खड़े, मै तो मरने लगा II

उनकी चूड़ियों की खनक में इश्क है,
उनकी सांसों की महक में इश्क है,
इश्क की परिभाषा, उनकी हर अदा है,
बिन बोले उनकी हर भाषा में इश्क है II
                                         - Suresh Kumar
                                                09/12/11

Thursday, November 10, 2011

नयन...

रहब़र की राह तकते नयन,
प्रेम-धुन में रमते नयन,
नयनों की भाषा बस वो जाने,
देखन जिनको तरसे नयन I

रति स्वरूप सुन्दर काया,
मनः दशा उनकी माया.
दर्शन-अभिलाषी बस तेरा,
नमन तुम्हे करते नयन I


नयन कभी नही थकते है,
आस लिये नित रहते है,
राहों में रहबर मिल जाये,
खुदा से मन्नत करते है I


इक झलक मेरे दिलबर की मिले,
तब दिल की ये धड़कन भी चले,
आ मिल जा तू इन राहों में,
नयनों से झर-झर नीर बहे I


नीर की हर इक बूँद में,
दिलबर का चेहरा दिख जाता,
दूर बहुत रहबर है लेकिन,
महसूस उन्हे मै कर पाता,
पल-प्रतिपल, इत-उत-चहु ओर,
दर्शन तुम्हरे करते नयन I


रहब़र की राह तकते नयन,
प्रेम-धुन में रमते नयन,
नयनों की भाषा बस वो जाने,
देखन जिनको तरसे नयन II

                                  -----  सुरेश कुमार
                               १०/११/११

Saturday, October 22, 2011

मैं बहुत दूर चला जाऊँगा....

दिल-ए-तन्हाइ , तेरी याद आयी,
लम्हो संग अस्क बहे, भीगे परछाई,
सिकवा-ए-ज़िन्दगी हम करे भी तो क्यों,
ज़िन्दगी ने अक्सर, यही राह दिखायी.


मेरी तन्हाइयों की खबर,
लम्हों-लम्हों को है, उनको नही.
उनकी गली से गुज़रता हर लम्हा,
उन्हे देखता है.
हवा का इक-इक झोंका, जो मेरे करीब़
से गुज़रता है,
वफ़ा-ए-इश्क का मेहमां बन,
उनके घर ठहरता है.
बड़ा नादां, बड़ा ज़ालिम है मेरा दिल-ए-पागल,
हुये बेताब़, उनकी चौख़ट पर,
धड़कता है.


रहमत-ए-खुदा, गर हो, उनके ख्वाबों में,
ज़रूर आऊँगा,
अस्क का इक-इक कतरा उनकी यादों पर,
बहाऊँगा,
वफ़ा-ए-इश्क वो समझे या ना समझे,
अब अफ़सोस नही,
अफ़सोस ये है कि, जब तक वो समझेगी,
मैं बहुत दूर चला जाऊँगा.
मैं बहुत दूर चला जाऊँगा..................!!!

                                           सुरेश कुमार
                                             २२/१०/११






Tuesday, October 18, 2011

लम्हें... जो हसीन हैं...

वो लम्हे भी खुश्बू-ए-इश्क में,
तब्दील हो जाते है,
तुमसे मिलकर, तुम्हे छूकर,
जो मेरे करीब़ आते हैं.
लम्हों का रूख़, अब बदल गया,
इश्क के रंग, जिस्म-ए-रूह,
पर उड़ाते है.


उनकी ख़्वाइश थी कि,
वो मेरा हमसफ़र बनेंगे,
और हमने सफ़र-ए-जिन्दगी,
उनके नाम कर दी.
इतनी मोहब्बत है उनके दिल में,
कि मत पूछो,
अपनी परछाई भी,
उनका गुलाम कर दी.


जिन्दगी इक चाह है,
जिसका तुम बिन अंत है...
मंजिल-ए-कारवाँ तुम संग मुमकिन है,
तुम संग जिन्दगी, अंतहीन है...

                                           सुरेश कुमार
                                            १८/१०/२०११

Tuesday, October 11, 2011

वरना मै था ही नही....

जिन्दगी का हर
लम्हा तुम्हें सौंप दिया,
बस ये सोचकर कि तुम
मेरी जिन्दगी हो.
जी करता है, वक्त के
अंतिम सांस तक
तुम्हे प्यार करूं,
भू की अंतिम
परिक्रमा से परे
प्यार करता रहूँ.
तुम हो, मैं हूँ,
वरना मै था ही नही.


मेरी ख़ामोशियों का शोर
सिर्फ़ तुमने सुना,
महसूस किया,
दिल की अबोध धड़कन
को धड़कना सिखाया.
बिन तुम्हारे तो मेरा
अस्तित्व ही नहीं,
तुम हो, मैं हूँ,
वरना मै था ही नही.


                          सुरेश कुमार
                            ११/१०/११





Wednesday, September 28, 2011

रूप-स्वरूप-दिल-ए-ख्वाइश....

ना अंजन, ना श्रृंगार, अद्भुत तेरी सौन्दर्य छटा,
तन यौवन का चरमबिन्दु, अधर खुले, बरसे घटा,
बंद पलक में निशा बसे, खुली पलक में भोर,
हृदय-मुग्ध करती हो प्रतिपल, इत-उत व चहुँ ओर.[१]


बिन घुँघरू पग अतिशोभित, बिन कंगन ये हस्त,
प्रकृति-अंश समान ये काया, करे सदा मदमस्त,
मनु तुम-पर मन से मरा, इतना सुन्दर रूप,
तुम सावन हो, तुम बरखा, तुम हो रति स्वरूप. [२]


*****************************************


मैं देखूँ इश्क की गलियाँ, मुझे ऐसी नज़र दे दो,
छुपालो अपनी आँखों में, सुकूँ की इक बसर दे दो.
मैं राही हूँ मोहब्ब्त का, मोहब्बत रग में बसती है.
चलो अब साथ बस मेरे, कसम ये हमसफ़र दे दो. [३]


खुश्बू-ए-इश्क के पंछी, चलो हम साथ उड़ जायें,
जहाँ हो अन्त लम्हों का, वहाँ जाकर ठहर जायें,
बसायें आशियान इक, मोहब्बत नाम हो उसका,
हम जीते है मोहब्ब्त में, मोहब्बत में गुज़र जायें. [४]


                                                                                            सुरेश कुमार
                                                             २८/०९/२०११

Sunday, September 11, 2011

तुम बिन मेरी परिभाषा.....














विरह, वेदना, क्रन्दन,
रोता, बिलखता अबोध मन,
अप्रत्यक्ष जीवन,
उत्कंठित नयन,
मृत इच्छा उद्बोधन,
चहु दिशा अप्रसन्न,
मुर्झाया उपवन,
शून्य-तनन-संवेदन,
यथासमय शिरश्छेदन,
मत-भ्रमित अवलोकन,
उत्सावाग्नि चुभन,
अभिलाषा अभिशून्यन,
भावशून्य अध्यर्थन,
पराकष्ठा ठिठुरन,
दिशाहीन अन्तर्मन,
गहन तिमिर संचयन,
सर्वसुख समापन,
हर्षविहीन नव दुल्हन,
आत्म-सुख निरन्तर दहन,
प्राणप्रिये !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
यही है......................
तुम बिन मेरी परिभाषा.

                  सुरेश कुमार
                  ११/०९/२०११